जनगणना से पहले आदिवासी धार्मिक पहचान पर नई बहस
जनगणना से पहले छिड़ी नई बहस: आदिवासी धर्म और पहचान को लेकर आमने-सामने दावे, ‘अन्य धर्म’ में दर्ज किए जाने का मुद्दा गरमाया
रायपुर/नई दिल्ली। जनगणना की प्रक्रिया के बीच आदिवासी समुदाय की धार्मिक पहचान को लेकर बहस एक बार फिर तेज हो गई है। झारखंड समेत आदिवासी बहुल क्षेत्रों में कुछ संगठनों की ओर से पारंपरिक आदिवासी आस्था को अलग पहचान के साथ दर्ज कराने की मांग उठ रही है। वहीं, जनजाति सुरक्षा मंच धर्म परिवर्तन और अनुसूचित जनजाति (ST) के दर्जे से जुड़े सवालों को लेकर अलग रुख रखता है।
हालिया घटनाक्रम में आदिवासी धार्मिक पहचान के लिए ‘सरना’ या ‘अन्य’ जैसे विकल्पों को लेकर चर्चा सामने आई है। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, झारखंड में जनगणना प्रक्रिया शुरू होने के बाद कुछ आदिवासी समूहों के बीच लोगों से धर्म वाले कॉलम में अपनी पारंपरिक आस्था दर्ज करने की अपील भी सामने आई।
जनजाति सुरक्षा मंच का क्या कहना है?
जनजाति सुरक्षा मंच लंबे समय से यह मांग उठाता रहा है कि पारंपरिक आस्था और संस्कृति छोड़कर दूसरे धर्म अपनाने वाले लोगों को ST सूची में मिलने वाले लाभों को लेकर पुनर्विचार किया जाए। 2026 में मंच की ओर से इस मुद्दे पर दिल्ली में बड़ा आदिवासी सम्मेलन भी आयोजित किया गया था।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी 28 मई 2026 को जनजाति सुरक्षा मंच के प्रतिनिधियों से मुलाकात की थी। प्रधानमंत्री कार्यालय के अनुसार, बैठक में आदिवासी समाज के विकास और सशक्तिकरण से जुड़े मुद्दों पर चर्चा हुई।
क्यों महत्वपूर्ण है यह मुद्दा?
धार्मिक पहचान का सवाल सिर्फ जनगणना के आंकड़ों तक सीमित नहीं है। आदिवासी समुदायों की अलग-अलग पारंपरिक आस्थाएं, संस्कृति और सामाजिक पहचान इस बहस के केंद्र में हैं। विशेषज्ञों और आदिवासी संगठनों के बीच इस बात पर भी चर्चा है कि जनगणना में समुदायों की धार्मिक पहचान किस तरह दर्ज की जाए ताकि आंकड़े उनकी वास्तविक सामाजिक स्थिति को बेहतर तरीके से दर्शाएं।
हालांकि, आपके द्वारा भेजी गई तस्वीर में जिस CSHD रिपोर्ट का उल्लेख है, उसके मूल दस्तावेज की स्वतंत्र पुष्टि मुझे उपलब्ध स्रोतों से नहीं मिली है। इसलिए पोर्टल पर इसे तथ्य के रूप में नहीं, बल्कि “रिपोर्ट में दावा” के रूप में ही प्रकाशित करना बेहतर रहेगा।
