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डीलिस्टिंग पर छिड़ी सियासी जंग

छत्तीसगढ़ में सियासत का नया ‘हॉट टॉपिक’, मतांतरित ईसाइयों की डीलिस्टिंग पर मचा घमासान

रायपुर। छत्तीसगढ़ की राजनीति में इन दिनों मतांतरित ईसाइयों की डीलिस्टिंग का मुद्दा सबसे ज्यादा चर्चा में है। यह विषय केवल राजनीतिक बहस तक सीमित नहीं है, बल्कि आदिवासी समाज, धार्मिक संगठनों और सामाजिक समूहों के बीच भी तीखी चर्चा का कारण बन गया है। डीलिस्टिंग की मांग और उसके विरोध ने प्रदेश की सियासत को गरमा दिया है।

दरअसल, डीलिस्टिंग का मतलब उन लोगों को अनुसूचित जनजाति (ST) की सूची से बाहर करना है, जिन्होंने धर्म परिवर्तन कर ईसाई धर्म अपना लिया है। इस मांग के समर्थन में कई आदिवासी संगठन और सामाजिक मंच लगातार आवाज उठा रहे हैं। उनका तर्क है कि धर्म परिवर्तन के बाद संबंधित व्यक्ति को आदिवासी आरक्षण और अन्य संवैधानिक लाभ नहीं मिलने चाहिए।

क्या है डीलिस्टिंग की मांग?

डीलिस्टिंग की मांग करने वाले संगठनों का कहना है कि अनुसूचित जनजाति का दर्जा आदिवासी संस्कृति, परंपरा और सामाजिक परिस्थितियों के आधार पर दिया गया है। ऐसे में यदि कोई व्यक्ति धर्म परिवर्तन कर लेता है तो उसे मिलने वाले आरक्षण और विशेष सुविधाओं की समीक्षा होनी चाहिए।

समर्थकों का दावा है कि इससे वास्तविक आदिवासी समुदाय के लोगों को अधिक अवसर मिलेंगे और आरक्षण का लाभ सही पात्रों तक पहुंचेगा।

विरोध में क्यों उतर रहे संगठन?

दूसरी ओर ईसाई संगठन, सामाजिक कार्यकर्ता और कांग्रेस इस मांग का विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि आदिवासी पहचान किसी धर्म से नहीं, बल्कि समुदाय, संस्कृति और सामाजिक पृष्ठभूमि से जुड़ी होती है। इसलिए केवल धर्म परिवर्तन के आधार पर किसी व्यक्ति को उसके संवैधानिक अधिकारों से वंचित करना उचित नहीं होगा।

विरोध करने वाले पक्ष का यह भी कहना है कि डीलिस्टिंग की मांग सामाजिक विभाजन को बढ़ा सकती है और इससे आदिवासी समाज के भीतर नई खाई पैदा होने का खतरा है।

चुनावी राजनीति में भी बढ़ा महत्व

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आदिवासी बहुल क्षेत्रों वाले छत्तीसगढ़ में यह मुद्दा आने वाले समय में और अधिक प्रभाव डाल सकता है। प्रदेश की कई विधानसभा सीटों पर आदिवासी मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते हैं। ऐसे में डीलिस्टिंग का सवाल राजनीतिक दलों के लिए भी अहम बन गया है।

भाजपा समर्थित संगठनों द्वारा इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाया जा रहा है, जबकि कांग्रेस इसे संवेदनशील सामाजिक विषय बताते हुए सावधानी बरतने की बात कह रही है। इसी कारण यह मुद्दा राजनीतिक मंचों से लेकर सामाजिक बैठकों तक चर्चा का केंद्र बना हुआ है।

आगे क्या?

फिलहाल डीलिस्टिंग को लेकर बहस तेज है, लेकिन इस विषय पर अंतिम निर्णय केंद्र सरकार और संवैधानिक प्रक्रियाओं के तहत ही संभव होगा। हालांकि, छत्तीसगढ़ में जिस तरह यह मुद्दा राजनीतिक और सामाजिक विमर्श का हिस्सा बना है, उससे साफ है कि आने वाले दिनों में इसकी गूंज और तेज सुनाई दे सकती है।

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